मराठाकालीन छत्तीसगढ़ में भूराजस्व व्यवस्था
सुधा राय
शोधार्थी, इतिहास अध्ययन शाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर छत्तीसगढ
भूमिका
छत्तीसगढ़ में कल्चुरियों के शासन का स्वरूप केन्द्रीय था, किन्तु केन्द्र में योग्य एवं चरित्रवान नेतृत्व की अनुपस्थिति के कारण यह इस समय नियंत्रणहीन हो गया था । आरंभिक हैहय शासक योग्य थे, किन्तु 19 वीं शताब्दी के प्रारंभ में इनका गौरव लुप्त हो चुका था । इस समय के शासक नाममात्र थे । इनमें न योग्यता थी, न दृढ़ आत्मबल । इस समय रतनपुर एवं रायपुर शाखा के तात्कालीन शासकों क्रमशः रघुनाथ सिंह व अमरसिंह नितांत शक्तिहीन थे एवं उनमें महत्वाकांक्षा का अभाव था । जिससे हैहय शासन की दशा अत्यन्त दयनीय हो चुकी थी और उसका संगठन दोशपूर्ण था । केन्द्र में दृढ़ सेना का अभाव था । हैहय सरकार आर्थिक दृश्टि से दिवालिया हो गई थी । जनता पर कर का भार अधिक था । कृशि की बिगड़ी दशा के कारण आय कम हो गई थी । आर्थिक विपन्नता सरकार के समक्ष गंभीर चुनौती थी। जेकिन्स के अनुसार राज्य के अधिकांश भागों का विभाजन राज परिवार के सदस्यों व अधिकारियों के बीच हो गया था । ऐसी स्थिति में ऐसा कोई योग्य नेतृत्व नहीं था जो राज्य में शक्ति का संचार करता एवं मराठा शक्ति का सामना करता । 1741 ई॰ छत्तीसगढ़ के राजनीतिक इतिहास में महत्वपूर्ण परिवर्तन का काल था । पतन के कगार पर पहुॅंच चुके हैहय शासन का लाभ उठाकर नागपुर के भोंसला सेनापति भास्कर पंत ने आक्रमण कर दिया । सेना पति भास्करपंत ने बिना युद्ध के ही 1741 में रतनपुर पर कब्जा कर लिया ।1
छत्तीसगढ़ में कल्चुरि शासन के विभक्त होने से इनकी शक्ति इतनी क्षीण हो गई, जिसका लाभ मराठों को मिला । वैसे भी औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात 18 वीं शताब्दी में मराठे हिन्दुस्तान में एक शक्ति के रूप में उभर रहे थें । रतनपुर के रघुनाथ सिंह एवं रायपुर के अमरसिंह देव के समय सारे मध्य प्रांत में नागपुर के भोसलों का अधिकार हो गया । जिस समय भोसलों ने रायपुर और रतनपुर में प्रवेश किया उस समय किसी ने विरोध तक नहीं किया । मराठों ने सन् 1742 में बंगाल को लूटने के लिये कूच किया रास्ते में रतनपुर राज्य पड़ा । मराठों ने रतनपुर को घेर लिया । रघुनाथ सिंह राजकाज से वंचित कर दिया गया । उनके निकट संबंधी मोहनसिंह रतनपुर के राजा बनाये गये । इस प्रकार रतनपुर राज्य को सेनापति भास्कर पंत मराठा छत्रछाया के अंतर्गत ले आये एवं रतनपुर नरेश उनके सामंती राजा स्वीकार किये गये ।2
उस समय उसने रायपुर की शाखा को नही छेड़ा, किंतु ई. सन् 1750 में राजिम, रायपुर और पाटन के तालुके अमरसिंह को देकर उस पर 70,000 रूपये वार्शिक कर लाद दिया । 1753 में उनकी मृत्यु हो गई । शिवाजी भोसले सन् 1757 में शासन करने के लिये रतनपुर आये थे । उन्होने शिवराज सिंह को, उसके पुरखों के एक गांव के पीछे एक रूपया परवरिश के लिये लगा दिया । यह प्रबंध 1822 तक कायम रहा । इसके पश्चात गांव पीछे रूपया देना बंद कर दिया और उसके एवज में चार गांव माफी में दिये गये, जो अब तक उसी वंश के अधिकार में हैं ।3
सन् 1758 से 1858 तक का युग छत्तीसगढ़ के इतिहास में अंधकार का युग के समान था । विवाजी भोंसले और आनंदी बाई के पश्चात छत्तीसगढ़ का शासन रतनपुर से संचालित न होकर नागपुर से संचालित होने लगा ।
सूबा शासन -
बिंबाजी जी की मृत्यु के बाद छत्तीसगढ़ में भोसला शासन के वाइसराय के रूप में व्योकोंजी ने छत्तीसगढ़ में वाइसराय का पद संभाला परंतु सम्पूर्ण शासन का भार सूबेदारों पर छोड़ दिया । खुद नागपुर की राजनीति में उलझे रहे । व्योकोजी को छत्तीसगढ़ में सूबा शासन का संस्थापक माना जाता है । ये सूबेदार निजी स्वार्थों व धन संचय की भावना से प्रभावित थे । परिणाम स्वरूप छत्तीसगढ़ में आतंक, अराजकता, अनिश्चितता एवं अव्यवस्था की स्थिति बनी रही ।4 इस शासन के दौरान छत्तीसगढ़ के अनेक गांव वीरान हो गये लोग कठिनाइयों के शिकार बनते रहे । कृशि की दशा दयनीय हो गई एवं सन् 1818 तक यहां के राजस्व में 3 लाख से अधिक वृद्धि न हो सकी । जबकि सूबाशासन से पूर्व राजस्व की मद लगभग साढ़े छः लाख रूपये था ।5
प्रशासनिक अनुभव हीनता के कारण सूबेदारों के दफ्तरों की दशा अत्यंत दोशपूर्ण, अपूर्ण और अव्यवस्थित थी ।6 सूबेदार मनमानी ढंग से खर्च करने के लिये स्वतं़त्र थे । उनके स्थायित्व का प्रश्न अनिश्चित होने के कारण उनके हृदय में जनहित की भावना नहीं रहती थी ।7 अतः सूबा शासन के अंतर्गत छत्तीसगढ़ में केवल पीड़ा, आतंक और लूटखसोट का ही बोलबाला रहा ।8 सत्ता संघर्श में लीन मराठा शासकों की उपेक्षा का शिकार छत्तीसगढ़ को होना पड़ा । सन् 1818 में जब सूबेदारी शासन का अंत नाटकीय ढंग से हुआ तब इस क्षेत्र की जनता ने राहत की सांस ली । विट्ठल दिनकर ने राजस्व व्यवस्था में परगना पद्धति की शुरूआत किया ।9 विट्ठल दिनकर ने राजस्व व्यवस्था में परगना पद्धति की शुरूआत की ।10 छत्तीसगढ़ में परगनों की संख्या 27 थी ।11 संपूर्ण छत्तीसगढ़ का शासन दो भागों में विभाजित किया गया ।
1. खालसा क्षेत्र
2. जमींदारी क्षेत्र
खालसा पर उन्होनें प्रत्यक्ष शासन का अधिकार रखा और जमींदारी क्षेत्र को जमींदारों के स्वतंत्र शासन में रखा ।12 जमींदार मराठों द्वारा निर्धारित राशि नियमित एवं निश्चित रूप से शासन को अदा करते थे । मराठे लगान वसूली के तरीके भूमि नाप एवं किसानों और गौंटियों के बीच संबंध मेें कोई नया नियम लागू नहीं किया गया । इनके द्वारा शासन में आने वाले परिवर्तन का मात्र लेखा-जोखा और राजस्व की वसूली को नियमित बनाना था ।13
मराठों ने सन् 1790 ई. में ही राजस्व के क्षेत्र में कुछ परिवर्तन करने का प्रयाय किया था । लेकिन वे उसे पूरी तरह से वैज्ञानिक न बना सके । भूमिकर का निर्धारण का काम ग्राम्य स्तर पर होता था । इस नियम में नागपुर शासन के अनुकूल समय-समय पर परिवर्तन होते रहते थे ।14 भूमि की नाप का आधार किसानों के हलों की संख्या थी । कर के निर्धारण का कार्य गौंटिया और किसानों के मध्य आपसी समझौते के आधार पर किया जाता था । जमीन संबंधी कोई अभिलेख नहीं रखा जाता था । प्रत्येक परगने का कर निर्धारण पूर्व प्रचलित परंपरा और क्षेत्र की समकालीन परिस्थिति को ध्यान में रखकर किया जाता था । कर-वसूली नागपुर से प्राप्त निर्देशानुसार विगत वर्श की वसूली के आधार पर की जाती थी । राजस्व में बराबर वृद्धि करते रहने की आम परम्परा थी ।
संपूर्ण प्रदेश में राजस्व की वसूली में लूट सी मची हुई थी । कर-वसूली के लिये न कोई सामान्य सिद्धान्त था और न कोई निश्चित नियम ।15 फसलीय वर्श का प्रारंभ प्रतिवर्श जून से होता था । उस समय सूबेदार और कमाविसदार क्षेत्रीय किसानों को अधिक-से-अधिक तादाद में जमीन को जोत के अन्तर्गत लाने के लिये प्रोत्साहित करते थे । भूमि वितरण के संबंध में गांव का गौटिया किसानों की सामूहिक शिकायतें सुनकर के उनके संतोश के अनुसार भूमि का वितरण करता था । बोनी समाप्त होने पर कमाविसदार क्षेत्रिय किसानों से विगत बकाया राशि की वसूली के तगादे भी करता था । अगस्त के अंत तक सूबेदार सभी कमाविसदारों को कुल राजस्व की राशि का एक तिहाई अंश वसूल कर उसे अक्टूबर तक खजाने में जमा कराने के आदेश देता था । वह उसे पिछला बकाया वसूल करने की भी आज्ञा देता था ।
परगना के वार्शिक लगान का एक तिहाई भाग वसूला जाकर सितंबर या अक्टूबर माह में खजाने में जमा कर दिया जाता था । परंतु यह वार्शिक कर-निर्धारण परती भूमि, मौसम की खराबी, जानवरों की बीमारी आदि का ख्याल रखकर किया जाता था । लगान की दूसरी किस्त एक तिहाई अंश की ही होती थी । उसकी अदायगी भी 5 जनवरी को की जाती थी । कमाविसदार अपने क्षेत्र का दौरा कर वहां की परिस्थितियों को मालूम करता था । लगान की तीसरी और अंतिम किस्त की वसूली का तरीका भी दूसरी किस्त की ही तरह था । तथा इसकी वसूली की अंतिम तिथि 5 अप्रैल थी । दूसरी किस्त के पश्चात जनवरी के अंतिम सप्ताह में सूबेदार अपना दौरा प्रारंभ करता था । जिसकी पूर्व सूचना कमाविसदार, गौटिया या पटेलों को दे दी जाती थी ।16 कर निर्धारण अभिलेख दफ्तर में होता था । परगने का फड़नवीस एक रिर्पोट तैयार करता था । परगना में राजस्व, पिछला बकाया, चालू वर्श की लगान राशि, किश्तों का विवरण किया जाता था । सूबेदार आठ दस सप्ताह में संपूर्ण प्रदेश का दौरा कर वार्शिक हिसाब बंद करता था और उसका विवरण नागपुर को भेज देता था ।17 मराठों ने राजस्व के क्षेत्र में पटेलों की नियुक्ति का प्रावधान किया ये एक से अधिक गांवों की देख- रेख करते थे ।18 कृशक इनके आश्रित होते हैं । मराठों ने भूमि व्यवस्था के लिए एक नवीन व्यवस्था का सूत्रपात किया जिसका नाम ताल्लुकादारी प्रथा रखा गया ।19
गौंटियाः छत्तीसगढ़ में यह पद प्राचीन काल से था । यह गांव का मुखिया होता था । उसका पद न तो वंशानुगत होता था और न ही उसे बेचा जा सकता था । गांव प्रधान होने के कारण वह गांव की सुख-सुविधा का ध्यान रखता था और जनता का आदर प्राप्त करता था । लगान निर्धाण एवं उसकी वसूली के लिये जिम्मेदार होता था । किसानों के सलाह से भूमि का आबंटन करता था । किसानों को आवास और काश्त की सुविधा प्रदान करता था । समय-समय पर उन्हें बीज, धन व जानवर से मदद भी पहुॅंचाता था । इन दायित्वों के निर्वाह के लिए उसे गांव में अनेक सुविधायें और रियायतें प्राप्त थी । उसे गांव में ‘सेराडोली’ नामक अतिरिक्त भूमि प्राप्त थी । उस भूमि पर गांव के किसान कृशि करते थे । एवं उससे होने वाली आय गांव में आने वाले अधिकारियों एवं यात्रियों के भोजन एवं आवास पर खर्च होता था ।20
संदर्भ ग्रंथ सूची
1. बलदेव प्रसाद मिश्रा, इतिहास खंड, शुक्ल अभिनंदन ग्रंथ से उद्धृत सन् 1955 पृ. 20
2. उत्थान, रायपुर के डिस्ट्रिक्ट कौंसिल का मासिक पत्र, 1937, पृ. 310-318, भाग 2, खंड 9, संख्या 12
3. प्रयागदत्त शुक्ल, ‘मध्यप्रदेश का इतिहास और नागपुर के भोंसले’, 1930,
पृ. 38, 98
4. जे. एफ. के. हैविट, ‘रिपोर्ट आन दि लैंड रिवेन्यु सेटलमेंट आॅफ रायपुर’, सन् 1869, पृ. 20
5. सी. यू. विल्स, ‘नागपुर इन नाइन्टीन सेन्चुरी’, पृ. 58
6. एगन्यू रिपोर्ट, सन् 1930, पृ. 22
7. अर्ली यूरोपियन, ट्रेव्हलर्स, सन् 1930, पृ. 55
8. चीशम की सेटलमेंट रिपोर्ट, सन् 1868, पृ. 33
9. सर रिचर्ड जेकिन्स, ‘रिपोर्ट आॅन दि टेरीटरीज आॅफ राजा नागपुर’, पृ. 110, सन् 1827
10. एगन्यू रिपोर्ट, सन् 1820 पृ. 12
11. जेकिन्स रिपोर्ट, सन् 1827, पृ. 110-116
12. एगन्यू रिपोर्ट, सन् 1820 पृ. 22
13. जेन्किन्स रिपोर्ट, 1827, पृ. 92
14. जेकिन्स रिपोर्ट, 1827, पृ. 93
15. डाॅ. आर. एम. सिन्हा, ‘भोसला आॅफ नागपुर, द करेन्ट फ्रेस’, पृ. 67-68
16. जेकिन्स रिपोर्ट, 1827, पृ. 95
17. डाॅ. पी. एल. मिश्रा, ‘दि पोलिटिकल हिस्ट्री आॅफ छत्तीसगढ़’, 1979, पृ. 92
18. जेकिन्स रिपोर्ट सन् 1869, पृ. 1,10
19. चीशम ‘रिपोर्ट आॅफ लैंड रेवेन्यु आॅफ दी सेटलमेन्ट आॅफ बिलासपुर डिस्ट्रिक्ट’, सन् 1868, पृ. 145
20. एगन्यू रिपोर्ट, सन् 1820, पृ. 37-38
Received on 17.07.2014
Revised on 19.08.2014
Accepted on 20.09.2014
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Research J. Humanities and Social Sciences. 5(3): July-September, 2014, 350-352